Saturday, 21 January 2017

मुझको अपना श्रृंगार बनाओ - मुक्ता


नजर तेरी श्रृंगार है मेरा
फिर क्यों हल्दी उबटन लगाऊ मैं ,
जब मिले तुमसे नजरें ओ मेरे साजन
यूँ ही निखर जाऊँ मैं ।

बिखरी-बिखरी ज़ुल्फें ही तो मेरी
तुमको अच्छी लगती हैं ,
बंध कर मेरी जान कहो, कब महोब्बत संवरती है ।

बिखरी हुई ये ज़ुल्फें तेरी, मेरे कानो मैं कुछ कहती रहें ,
गुदगुदाते हुए कान मेरे ख्वाहिशें तेरी समझते रहें ,
गजरे की महक नहीं तुम
अपने तन की खुशबू लाओ ,

श्रृंगार की तुम जद्दोजहद छोडो
मेरा इश्क़ को पहन कर आओ
मुझको अपना श्रृंगार बनाओ तुम
मेरी हो, मेरी बनकर आओ तुम ।


                         ------- मुक्ता भावसार