Friday, 3 June 2016

मानव कौल की क़िताब से



मैंने हर बार रख दिया है
ख़ुद को पूरा-का-पूरा खोलकर
खुला-खुला-सा बिखरा हुआ
पड़ा रहता हूँ
कभी तुम्हारे घुटनों पर
कभी तुम्हारी पलकों पर
तो कभी ठीक तुम्हारे पीछे |

बिखरने के बाद का
सिमटा हुआ-सा मैं
‘था’ से लेकर ‘हूँ’ तक
पूरा-का-पूरा जी लेता हूँ ख़ुद को
फिर से
मेरे जाने के बाद
तुम शायद मुझे पढ़ लेती होगी
कभी अपने घुटनों पर
कभी अपनी पलकों पर
पर जो कभी ‘ठीक तम्हारे पीछे’ बिखरा पड़ा था मैं
वो ....?
वो शायद पड़ा होगा ‘अभी भी’ की आशा में
मैं ख़ुद को समेटे हुए
फिर से आता हूँ तुम्हारे पास
फिर
बार-बार
और हर बार छोड़ जाता हूँ
थोड़ा-सा ख़ुद को


ठीक तुम्हारे पीछे |

           --क़िताब है 'ठीक तुम्हारे पीछे'
               लेख़क - मानव कौल